Tuesday, October 26, 2010

चाँद बढा इतराता है

चाँद बढा इतराएगा
चादर कास कर सो जायेगा

शाम को उसकी दावत है
सज धज के मामा आएगा
पीली थाली से चेहरे पे
प्यारी मुस्कान सजाएगा

भूख से व्याकुल महिलाए
चक्कर खा, भोग लगाएंगी
श्रद्धा से शीश झुकएँगी

पास खड़े कुरतेधारी आज secondary हो जायेंगे
जब चंदा खुश हो जायेंगे
तब ही focus में आयेंगे

और एक साल चंदा मामा
सूरज को रोज़ चिढ़ायेंगे
तुम पे तो जल ही चढ़ता है
पर आज मेरी महिमा देखो

हर घर में मेरी आहट के
चर्चे दिन भर ही रहते हैं
और प्रथम दरस को पाते ही
ऐसा welcome हम पाते हैं

फिर चाँद बढा इतराता है
शाम की आव-भगत को सोच
वो चादर कस सो जाता है

2 comments:

  1. Why don't you type in Hindi using the Google Transliterator? It would be nice to read!

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  2. This template I have chosen is quite outdated.
    Does not even have full-fledged text editor.

    But will try if Transliterator would work.

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