Sunday, April 17, 2011

भीष्म-परशुराम

Introduction : This is an attempt at writing Ballad.
It is from one of the sub-stories mentioned in Mahabharat.
Amba(a princess) rejected by her affianced and Bhishma's step-brother, requests Bhishma to accept her as his wife. Bhishma who had sworn to remain a bachelor, rejects her request. She then goes to Parshuram who was Bhishma's teacher, to seek revenge from him on her behalf. Who then challenges Bhishma to a duel, to decide the fate of Amba.

This led to one of the most beautiful duel of the times between the mighty warriors.. as the story follows..



भीष्म परशुराम का
द्वन्द फिर चलता रहा
परशु और तलवार से खन-खन-खना बजता रहा
लढते रहे
भिढ़ते रहे
वायु जल सर्वत्र में जोहर नए करते रहे

परशु की टंकार से हर तरफ हाहाकार था
भीष्म की तलवार भी इन्द्र-वज्र
समान थी

देव-यम-नक्षत्र सब आकाश से थे देखते
इस नृत्य
समान युद्ध के तांडव-इया पेंतरे

रक्त-सागर नेत्र थे
अंगों में दौढे दामिनी
वायु डरे पीछे खड़ा
कौशल दिखाते महारथी

युद्ध-दो क्षत्रियों का
युद्ध-था सिद्धांत का
धर्म दोनों पुरुषो का
स्व-धर्म को रखना बचा

दिन गए
रात्रि प्रहार , युद्ध ऊर्जा से प्रज्जवलित

युद्ध-मद में चूर
क्षत्रियो में, परास्त करने का जुनून

हर खण पे तण
खं-नन्न ता-ननं
वार- चक्कर - वार फिर
वार तल, तलवार का
फलांगना
धरती-विहीन ही धावना

मन शुन्य था
तर्क - वितर्क विहीन था
हम क्युं भिढ़े
कैसे लढ़े, उस विषय से अन्भिज्ञ था

बाहू! मेरा ह्रदय है
तलवार! मेरी जीव-श्वास
जब तक ये-मेरे दास हैं
शत्रु! नहीं आएगा पास

परशु मेरा मित्र है
ये युद्ध-बंधु है मेरा
कर वार पे हर वार तू
बचने ना पाए धड़ वहां

थे घाव हर एक अंग पे
शस्त्र भी चीत्कारते
पर युद्ध-मद में चूर योद्धा
हर दिन-पहर थे गाजते

हर-पहर, दिन, बढ़ गए
उन्नीस बीस
इक्कीस बाईस..

सहन-शक्ति, उन्मुक्तता
इंधन यही था बस बचा
और फिर हुआ तेईसव़ा..

जब मन कहीं सुशुप्त सा
लेने लगा अंग-ढईया..
कुछ सोच-विचार
लघु-भर किया

देवताओं के विघ्न से
युद्ध, पढ़ा फिर छोढ्ना


तर्क तो बलवान था
और भीष्म योद्धा महान था
पर युद्ध की उस अग्नि
से
देह! अब-भी सुलग रहा

वो द्वन्द मेरा आखिरी
जिस फूँक से शुरू हुआ
युद्धाग्नि में जलते-जलते
तर्क ही विलुप्त हुआ

वो था-ना कोई धर्मं-युद्ध
ना-ही कोई रावण वहां
सूक्ति ना-थी उसमे कोई
ना ज्ञान उसका अंत था

जब हो खढे बाहू-बलि
कौशल तू देख द्वन्द का
जब वो लढ़े, जो ना रुके
धरती - गगन - वायु थमे
होते ना रावण - राम वो
वो भीष्म परशुराम हैं


2 comments:

  1. OMG! Ok, let me clarify something before I praise this one here. My shudh hindi ain't that strong, but however reading this I'm no doubt impressed by the way you've described the whole scene, with the minutest of details, but I'm also more impressed by the words you've used! Wow! I've never seen such strong hindi words used so beautifully! I've read the poem just once, but I will have to read it at least two more times to actually understand it! (I mean that in a good way!) :) You should write more hindi poems dude! BRAVO!

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  2. Thanks a lot nisha!
    1) for reading 2) for understanding 3) appreciating!
    It was a dream work and its not over as yet. While writing my focus was The 'fight' as it can be enacted on stage. The 'end' needs a little more work and is not as smooth as intended.
    But the writer in me is really content with your appreciation :)

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